गोपालक किसानों एवं गोशालाओं के लिए गोपालन पद्धति

1.गोशाला परिसर में रहने वाले सभी गोसेवकों के लिये सुबह-4:00 बजे जगना व 4:30 बजे गोष्ठों में गोमाता की सेवा में लगना व शाम को 7:30 बजे गोमाता की आरती में जाना अनिवार्य है।

2.प्रत्येक गोसेवक प्रेमपूर्वक, तन-मन व भाव से गोमाता की सेवा करें।  प्रत्येक गोमाता से प्रतिदिन प्रेमपूर्वक मिले व हाथ घुमाए जिससे गोमाता का वात्सल्य प्राप्त हो। गोमाता को बुलाने के लिये श्रेष्ठ शब्दों का ही प्रयोग करें।  गोमाता को अपषब्द न बोले,  मार-पीट न करे। गोमाता को कभी भूल से भी पैर नही लगाये ।

3.गोशाला के प्रत्येक गोष्ठ में समय पर चारा, दाला व सफाई होनी चाहिये। गोमाता आराम से खुली खड़ी रहकर प्रसाद जीम सके, इसलिए चारे की गमाण साफ करके गोमाता की संख्या के अनुसार पूरी गमाण में चारा डालें। चारा देते समय ध्यान रखें कि चारे में मिट्टी,  रेती, पत्थर, प्लास्टिक, लोहा, विष्ठा,  विषेले जीव के अण्डे, काँटे, लकड़ी इत्यादि न होवे। इस प्रकार की समस्या होने पर चारे को छानकर देवे। गमाणों के पास गिरे हुए अच्छे चारे को तुरंत गमाण में डाले। गमाण में ताजा व साफ चारा डालकर ही दाणा देवें। प्रतिदिन प्रत्येक गोमाता को 1 किलो दाणा देना अनिवार्य है। भींगोकर देने वाले दाणे को चारे के साथ अच्छी तरह मिलाकर जीमावे। गोष्ठ में हर समय चारा-पानी रहना चाहिये। सप्ताह में गमाण के पास दो बार हाथ फावड़ा से पूर्ति (गड्ढे भरना) करे,  ताकि गड्ढे न पड़े। चारे से भरी बैलगाड़ी व चारे की गमाण में जूते- चप्पल नहीं पहने।

4.पानी के कुण्ड को सर्दी के मौसम में शाम को उतना ही भरें जो सुबह तक गोमाता पी सके । सुबह कुण्ड साफ करके ताजा पानी भरें व गर्मी के मौसम में दिन में तीन बार जल भरें, दोपहर में कुण्ड खाली न रहे इसका विषेश ध्यान रखें एवं सप्ताह में दो बार चूने का लेप व पास के गड्ढे भरें। कुण्ड साफ करते समय पानी निकासी हेतु नाली बना दी जाय जिससे कीचड़ ना हो। पानी लीकेज होने पर तुरत सूचना देवे। कुण्ड में लगे नल से सीधा मुँह लगाकर पानी नही पियें, सीधा पीने से पानी झूठा हो जाता है, कोई भी झूठा अन्न गोमाता को न जीमावे। कुण्ड में हाथ, पाँवमुंह व बर्तन न धोवे। जल की स्वछता का ध्यान रखे।

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