हरि इच्छा

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जैसे नदियाँ समुद्र के पास जाती हैं, उसी तरह सोने से मढ़े हुए सींगोंवाली दुग्धवती, सुरभि और सौरभेयी गौएँ मेरे निकट आवें । मैं सदा गौआें का दर्शन करूँ और गौएँ मुझ पर कृपादृष्टि करें। गौएँ मेरी हैं और मैं गौओं का हूँ, जहाँ गौएँ रहें, वहाँ मैं भी रहूँ।’

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