रचनात्मक गोसेवा महाभियान की प्रेरणा व प्राकट्य

रचनात्मक गोसेवा महाभियान की प्रेरणा व प्राकट्य

वेदलक्षणा गोवंश के लिये प्राणलेवा भयंकर दुष्काल ईस्वी सन् 1987 से 1993 के मध्य गोरक्षा आन्दोलन का विधेयात्मक (सकारात्मक) स्वरूप देशवासियों के सामने आया। उपरोक्त समयावधि में माँ नर्मदा एवं कल्पगुरु दत्तात्रेय भगवान की प्रेरणा से परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्रीदत्तशरणानन्दजी महाराज का राजस्थान की भूमि पर लम्बे अज्ञातकाल के बाद आगमन हुआ। कुछ सत्संगी साधकों द्वारा अगस्त सन् 1992 में एकान्त स्थली के रूप में सांचोर शहर के निकट आनन्दवन पथमेड़ा गोचरभूमि पर स्थित कामधेनु सरोवर के सन्निकट स्थान चयनित किया।

यह आनन्दवन पथमेड़ा भारत देश की वह पावन व मनोरम गोचारण भूमि है जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र से द्वारिका जाते समय श्रावण, भादों महिने में रुककर वृन्दावन से लायी हुई भूमण्डल की सर्वाधिक दुधारू, जुझारू, साहसी, शौर्यवान, सौम्यवान, ब्रह्मस्वरूपा वेदलक्षणा गायों के चरने व विचरने के लिए चुना था। यह आनंदवन मारवाड़, काठियावाड़ तथा थारपारकर की गोपालन लोक संस्कृति का ललित संयोग तो है ही, साथ ही भूगर्भ में बह रही पावन सरस्वती, कच्छ के रण में फैली हुई सिन्धु तथा धरा पर बहने वाली सावित्री (लुणी) नदी द्वारा जन्म-जन्म के पापों का शमन करने वाले श्रीकृष्ण, कामधेनु एवं कल्पगुरु दत्तात्रेय की आराधना का परम पावन त्रिवेणी संगम स्थल है। इसी मांगलिक धरा पर सतचर्चा एवं प्रयोगिक साधना का अनुष्ठान प्रारम्भ हुआ। भगवत् प्रेरणा से इस दिव्य धर्मधरा पर शीघ्र ही परमहंस श्रीमगारामजी राजगुरु एवं पूज्य सिद्ध बाबा हरिनाथजी महाराजका आगमन हुआ। यहाँ निवास करते हुए उपरोक्त महापुरुषों को भगवान की दिव्य गोचारण लीलाओं का स्फुरण हुआ। उसमें एक अतिविशिष्ठ भगवतलीला स्फुरणा में अनुभूति हुई कि ब्रज की सौम्यवान, शोर्यवान एवं ब्रह्मस्वरूपा उन्नत नस्ल की लाखों गोमाताओं के साथ गोप-गोपियों का समूह ब्रज से श्रीद्वारिकापुरी की ओर आ रहा है। उधर श्रीद्वारिकापुरी से श्रीद्वारिकाधीश भगवान अपने कई मंत्रीयों तथा परिजनों के साथ सामने आ रहे हैं। इन दोनों का मिलन इस भूमि पर हुआ, यहाँ कई दिनों तक परस्पर मिलन स्नेहमयी चर्चा और गोदर्शन पूजन, अर्चन करते हुए श्रीकृष्ण भगवान आनन्दातिरेक में विभोर रहे। श्रीउद्धवजी ने भगवान श्रीद्वारिकाधीश को स्मरण करवाया कि अभी-अभी द्वारिका बसी है, वहाँ पर अनेक प्रकार की आशंकाएँ विद्ध्यमान है अतः शीघ्र ही द्वारिकापुरी की ओर चलना चाहिए। श्रीद्वारिकाधीश बोले- कि हे उद्धव! इस स्थान पर भीतर-बाहर सर्वत्र आनन्द ही आनन्द की अनुभूति होती है। मुझे तो यह गोचर वन ही आनन्द से निर्मित लग रहा है,  वास्तव में यह आनन्दवन ही है। यहाँ पर मुझे अपनी अत्यन्त प्रिय गोमाताओं, गोपों आदि के साथ समागम प्राप्त हुआ है। इसी भूमि से वेदलक्षणा गोपालन लोक संस्कृति का विस्तार करने के लिये हमारे यदुवंशी परिवार के किसी एक गोप्रेमी वीर पुरुष का चयन किया जायेगा यह कहकर साथ में आये एक विशिष्ठ पुरुष से गो- गोप- गोपियों के प्रबन्ध का कार्य प्रारम्भ कराके फिर द्वारिकापुरी की ओर चल पड़े। इस लीला दर्शन के बाद प्रातःकाल पूज्य श्रीनाथजी एवं पूज्य श्रीपरमहंसजी ने गोऋषिजी से परामर्श करके इसी स्थान पर राष्ट्रव्यापी रचनात्मक गोसेवा महाभियान के लिये अभिजित् मुहुर्त में जाल (पिलू) के वृक्ष पर केसरिया ध्वज चढ़ाकर यह घोषणा की कि भारत में गोपालन लोक संस्कृति की पुनःस्थापना शंखनाद इसी जगह से होगा। इसके बाद में इस आनन्दवन गोचर भूमि को जहरीले किंकरों से मुक्त करवाया। इस भूमि पर सामाजिक सहयोग से वन्य जीवों की हिंसा पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया और एक जलकूप, कच्चा संत निवास तथा लघु वृक्षवाटिका का निर्माण किया गया।

सज्जनों! गत 12 शताब्दियों से कामधेनु, कपिला, सुरभि की सन्तान वेदलक्षणा गोवंश पर होने वाले अत्याचार रोकने के लिये 17 सितम्बर, सन् 1993 के दिन सद्गुरु श्रीदत्तात्रेय भगवान एवं जगद्गुरु श्रीगोपालकृष्ण भगवान के सर्वकल्याणकारी भाव से पुनः भारत की पवित्र गोचारण भूमि द्वारिका क्षेत्र आनन्दवन पथमेड़ा से राष्ट्रव्यापी रचनात्मक एवं सृजनात्मक गोसेवा महाभियान का सूत्रपात हुआ। जहाँ सांचोर- राजस्थान के गोरक्षक वीरों द्वारा पाकिस्तान की सीमा से कत्लखाने जाते हुए 8 गायें 5 बच्छड़ों सहित 13 गोवंश को छुड़ाकर इस भूमि पर लाया। स्थानीय गोभक्तों के निवेदन पर पूज्य परमहंस श्रीमगारामजी राजगुरु तथा सिद्ध बाबा हरिनाथजी महाराज के आत्मीय आग्रह एवं पूज्य श्रीगोऋषिजी की स्वीकृति से उपरोक्त वेदलक्षणा गोमाताओं के सहज, सर्वहितकारी आगमन पर गोसेवा का महाप्रकल्प इस धरा पर प्रारम्भ हुआ। पूज्य गोसेवा प्रेमी संतों एवं गोऋषिजी ने इस गोसेवा प्रकल्प का नाम श्री गोधाम महातीर्थ, आन्दवन पथमेड़ा’ रखा।

सन् 1994 में श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज के नोखा चातुर्मास अवसर पर गीताप्रेस के सम्पादक आदरणीय श्रीराधेश्यामजी खेमका से गोसेवा अभियान में प्रचारात्मक सहयोग की अपील परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्रीदत्तशरणानन्दजी महाराज द्वारा की गई जिसे उन्होंने सद्भाव से स्वीकार किया। परिणाम स्वरूप सन् 1995 में गोसेवा अंक का प्रकाशन हुआ जिससे पूरे देश को गोसेवा की रचनात्मक तथा सृजनात्मक दिशा प्राप्त हुई। सन् 1995-96 में ही श्री गोधाम पथमेड़ा से प्रेरणा लेकर गोप्रेमी सन्तों, धर्मात्मा सज्जनों के आग्रह से राजस्थान तथा मध्यप्रदेश में गोवंशहितार्थ गोरक्षा अधिनियम में विशेष संशोधन किये गये।

2 फरवरी 1997 में गोधाम पथमेड़ा के पास राष्ट्रीय राजमार्ग 15 से कत्लखाने जाते हुए सैंकड़ों ट्रकों में लदा हुआ हजारों वेदलक्षणा गोवंश स्थानीय गोरक्षक वीरों द्वारा संघर्षपूर्वक मुक्त कराया गया। इस संघर्ष में कई गोरक्षक घायल हो गये और कईयों को जेल भी जाना पड़ा। अन्ततोगत्वा राजस्थान सरकार ने माना कि प्रशासन की गलती से ही इतनी बड़ी संख्या में गोवंश कत्लखाने जा रहा था, इसमें रक्षकों की गलती नहीं थी। अतः सभी गोरक्षकों को निर्दोष घोषित किया गया। इसके बाद राजस्थान व गुजरात में अनेक स्थानों से गोरक्षकों तथा पुलिस द्वारा गोवंश को कसाईयों से छुड़वाकर श्री गोधाम पथमेड़ा के आनन्दवन परिसर में ही भेजा जाने लगा। नवम्बर सन् 1999 तक इस परिसर में गोवंश की संख्या 45 हजार तक पहुँच गयी। जगह कम पड़ने के कारण शेरपुरा और टेटोड़ा (गुजरात) तथा गोलासन व खिरोड़ी राजस्थान की गोचरभूमियों पर नये गोसेवा केन्द्रों की स्थापना की गई।

पूज्या गोमाता, परम पूज्य सद्गुरुदेव भगवान एवं मां नर्मदा, गौरी की आज्ञा व सत् पुरूषो के स्वपनादेश पूज्य श्री ब्रह्मऋषि मगारामजी राजगुरु, श्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी महाराज एवं सिद्ध बाबा हरिनाथजी, पूज्य श्रीत्यागमूर्ति गणेशानन्दजी महाराज की प्रेरणा से परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्रीदत्तशरणानन्दजी महाराज के मार्गदर्शन में 18-20 दिसम्बर, 1999 को श्री पथमेड़ा गोधाम के आनन्दवन परिसर में ऐतिहासिक एवं अनुपम ‘‘राष्ट्रीय कामधेनु कल्याण महोत्सव’’ का दिव्य आयोजन हुआ। जिसमें देश के मूर्धन्य धर्माचार्यगण, संत-महात्मा, गोप्रेमी समाजों के धर्मगुरू, समाज के मुखिया, कई सेवा संगठनों के प्रमुख, अनेक राजनैतिक पार्टियों के पदाधिकारी, केन्द्रीय तथा प्रांतीय शासन के प्रतिनिधिगण, गोभक्त धर्मात्मा व्यापारी, गोवैज्ञानिक तथा गोपालक किसानों ने लाखों की संख्या में भाग लिया। इस अपूर्व राष्ट्रव्यापी रचनात्मक महाभियान के प्रथम आयोजन की सफलता से घबराकर गोघातियों ने 20 दिसम्बर की रात्रि को फलौदी जोधपुर (राजस्थान) से रेल द्वारा कत्लखाने जाते हुए गोवंश को रोकने के लिए रेलवे पटरी पर धरना देकर बैठे हुए गोरक्षक गोभक्त श्रीमुरलीधरजी बोहरा की हत्या कर दी गई। गोभक्तों के दबाव से सरकार ने हत्यारों को गिरफ्तार करके कारावास में डाला। राजस्थान सहित सम्पूर्ण भारत में गोरक्षा अभियान को गतिशील बनाए रखने के लिए आयोजन प्रतिवर्ष गीता जयन्ती के पावन पर्व पर 2010 से पूर्व ‘राष्ट्रीय कामधेनु कल्याण महोत्सव’ एवं गोपाष्टमी पर्व पर 2011 से ‘‘गोनवरात्रि महोत्सव’ के रूप में श्रीपथमेड़ा गोधाम की प्रेरणा से होते रहे है।

इस लम्बी अवधि में श्री गोधाम पथमेड़ा द्वारा प्रायोजित राष्ट्रव्यापी रचनात्मक गोसेवा महाभियान के अन्तर्गत द्वादश राष्ट्रीय कामधेनु कल्याण महोत्सव तथा पांच गोनवरात्रि महामहोत्सव, गोसेवा संत समागम, विराट गोरक्षा सम्मेलन, गोभागवत कथा, गोभक्तमाल कथा, गोकथा, गोवत्स पाठशाला, गोविज्ञान संगोष्ठियाँ, गो-गोविन्द संकीर्तन आदि गोरक्षार्थ, गोहितार्थ अनेक मांगलिक एवं प्रेरक अनुष्ठानात्मक कार्यक्रम देश के विभिन्न भागों में आयोजित हुए। इन आयोजनों में भारत के मूर्धन्य सन्त महापुरूषो, गोभामाशाहों, देश के प्रमुख शासकों, धर्मात्मा गोभक्तों, गोसेवी संस्थाओं के संचालक गोसेवकों एवं सहस्रों गोपालक किसानों ने भाग लिया।

श्री गोधाम पथमेड़ा द्वारा प्रायोजित राष्ट्रव्यापी गोसेवा महाभियान का अनुकरण करते हुए पूरे देश में एक अघोषित एवं असंगठित रचनात्मक तथा सृजनात्मक गोसेवा आन्दोलन का प्राकट्य हुआ। राजस्थान, गुजरात,  पंजाब, छत्तीसगढ़,  उड़ीसा,  उत्तराखण्ड,  हरियाणा,  हिमाचल,  महाराष्ट्र,  कर्नाटक सहित अनेक प्रांतों में पूज्य गोप्रेमी संतो की प्रेरणा तथा मार्गदर्शन में प्रादेशिक गोसेवा समितियों का गठन हुआ और देश के विभिन्न भागों में साढ़े पांच हजार से अधिक वेदलक्षणा गोवंश संरक्षण केन्द्र प्रारम्भ किये गये, एक हजार से अधिक गोसंवर्धन केन्द्रों की स्थापना हुई, सौ से अधिक स्थानों पर पंचगव्य परिष्करण एवं अनुसंधान का कार्य प्रारम्भ हुआ,  हजारों किसानों ने गो-आधारित कृषि उद्ध्योग को पुनः अपनाया,  लाखों किसानों ने घर-घर गोपालन प्रारम्भ किया, लाखों धर्मात्मा लोग प्रतिदिन गोग्रास प्रदान करने लगे और इतने ही लोग अपने दैनिक जीवन में पंचगव्य प्रयोग के लिये संकल्पित हुए तथा लगभग दस प्रांतों में गोरक्षा एक्ट में संशोंधन हुए और भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गोवंश की रक्षा के पक्ष में ऐतिहासिक निर्णय दिया गया।

इस अवधि में विशेष उल्लेखनीय कार्यक्रम सन् 1999 में महोत्सव के अवसर पर देश के अनेक संतों,  महापुरुषों और गोभक्त धर्मात्माओं की उपस्थिति में पूज्य त्यागमूर्ति स्वामी श्रीगणेशानंदजी महाराज एवं ब्रह्ऋषि श्री विश्वात्मा बावराजी महाराज तथा माननीय अशोकजी सिंघल के करकमलों से सम्पूर्ण गोवंश संरक्षण हेतु नियमित गोग्रास अर्पण योजना प्रारम्भ की गई। सन् 2005 में राष्ट्रीय कामधेनु कल्याण महोत्सव के अवसर पर जगद्गुरु शंकराचार्यजी महाराज, पूज्य ब्रह्ऋषि श्रीतुलसारामजी महाराज सहित देश के प्रमुख संतों की पावन सन्निधि में भारत के तत्कालीन महामहिम उपराष्ट्रपति श्रीभैरूसिंह शेखावत द्वारा गोचर भूमि विस्तार हेतु अक्षय भूमिदान योजना प्रारम्भ की गयी थी। इन योजनाओं से देश के अनेक धर्मात्मा सज्जन जुड़कर नियमित गोसेवा कर रहे है।

श्रीपथमेड़ा गोधाम की पावन प्रेरणा से कर्नाटक राज्य के रामचन्द्रपुर में सन् 2007 को गोकर्णपीठाधीश्वर श्रीराघवेश्वरभारतीजी महाराज के संयोजकत्व में विश्व गोरक्षा सम्मेलन का आयोजन हुआ। जिसमें अनुमानित 17 देशों के 15 लाख लोग सम्मिलित हुए। इस सम्मेलन से दक्षिण भारत में गोभक्ति की लहर सी चल पड़ी थी।

सन् 2008 में राजस्थान प्रदेश में सम्पूर्ण गोवंश संरक्षण के लिये हजारों गोभक्तों द्वारा सत्याग्रह किया गया जिसमें स्वामी श्रीनारायणपुरीजी महाराज, ब्रह्मचारी श्रीजगदीश चैतन्यजी महाराज, पं. श्रीपुखराजजी द्विवेदी की अगुवाई में 63 गोभक्त आमरण अनशन पर बैठे थे और पूरा प्रदेश आन्दोलित हो रहा था। आन्दोलन के पाँचवें दिन राज्य सरकार का एक विशेष प्रतिनिधिमण्डल वायुयान द्वारा श्रीपथमेड़ा गोधाम के आनन्दवन परिसर में पहुंचा और वहाँ पर संतों व गोभक्तोंके समक्ष सहस्रों गोमाताओं के मध्य विकलांग गोवंश सम्पोषण सहित गोसेवार्थ विभिन्न प्रतिज्ञाएँ की गई थी।

सन् 2009 में योगऋषि स्वामी श्री रामदेवजी महाराज के सान्निध्य में कामधेनु क्रान्ति योग विज्ञान शिविर तथा ब्रह्ऋषि श्रीतुलसारामजी महाराज का चातुर्मास गो-मंगल महोत्सव गोधाम पथमेड़ा में हुआ जिससे सहस्रों लोगों ने नियमित गोसेवा का संकल्प लिया और लगभग आधे भारत में गोसेवा का संदेश पहुंचाया।

सन् 2010 में पूरे देश में जन- जाग्रति हेतु गोकर्णपीठाधीश स्वामी राघवेश्वरभारतीजी के सान्निध्य में तथा रा.स्व.संघ के संयोजकत्वमें विश्व मंगल गोग्राम यात्रा द्वारा भारत के प्रत्येक गाँव तक गोसेवा का संदेश पहुंचाने का प्रयास हुआ।

सन् 2011 में 52 सौ वर्षों के बाद पुनः गोनवरात्र अनुष्ठान के रूप में आदि शक्ति सुरभि गोमाता की उपासना के प्रचारार्थ ‘‘भारतीय गोकल्याण महामहोत्सव’’ का विराट आयोजन अर्बुदारण्य क्षेत्र में गोधाम पथमेड़ा द्वारा स्थापित एवं संचालित श्री मनोरमा गोलोकतीर्थ, नन्दगांव परिसर की पावन भूमि पर सम्पन्न हुआ। इस आयोजन में भारत के गोप्रेमी सन्तों को,  गो-उपासक विद्वानों को,  गोभक्त भामाशाहों को तथा गोपालक किसानों को पूज्या गोमाता की कृपा से अद्भुत अवर्णनीय आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति हुई। इसके बाद तत्काल पूज्य श्री स्वामी राजेन्द्रदासजी महाराज के सान्निध्य में ब्रज चौरासी कोस ‘‘गो-यात्रा’’ का पावन अनुष्ठान हुआ जिससे हजारों लागों को गोपालन तथा गोव्रत लेने की अमोघ प्रेरणा प्राप्त हुई तथा परमहंस स्वामी श्रीप्रज्ञानानन्दजी महाराज के मार्गदर्शन में गोसेवा समिति, उड़ीसा का गठन किया गया।

सन् 2012 में इस तरह का दिव्य और भव्य आयोजन सूर श्याम गोशाला चन्द्रसरोवर में सम्पन्न हुआ। जिससे ब्रजवासियो में पुनः द्वापर युग की  स्मृतियाँ जाग्रत हो गई।

13 मार्च 2013 को राजस्थान के गोभक्तों द्वारा गोवंश के हितार्थ राजधानी जयपुर में ऐतिहासिक ‘‘सुरभि संकीर्तन मोर्चा’’ का आयोजन हुआ। जिसमें 30 हजार से अधिक गोभक्त-गोप्रेमी सम्मिलित हुए। परिणाम स्वरूप स्वतन्त्र भारत में पहली बार तत्कालिक मुख्यमंत्री श्रीअशोकजी गहलोत, राजस्थान सरकार ने विकलांग गोवंश के सतत् पोषण व चिकित्सा का स्थायी अध्यादेश पारित किया।

 

सन् 2014 की गोनवरात्रि महोत्सव के बाद पूज्या गोमाता की कृपा प्राप्ति हेतु गो-गायत्री दिव्य उपासना की पावन प्रेरणा गोसेवा प्रेमी सन्तों के पवित्र हृदय में स्फुरित हुई। यह पावन अनुष्ठान श्री गोधाम पथमेड़ा के आयोजकत्व में विश्व में गोहत्या का कलंक समूल मिट जाय,  गोपालन लोकसंस्कृति की पुनः समाज में प्रतिष्ठा हो एवं  वेदलक्षणा गोमाता की रक्षार्थ 7 नवम्बर, सन् 1966 में बलिदान हुए सैंकड़ों देवात्माओं को भावांजलि देने हेतु संतों की प्रेरणा से ही श्री गोधाम पथमेड़ा के बहुआयामी प्रकल्प श्रीमनोरमा गोलोकतीर्थ,  नन्दगांव के परिसर में दिसम्बर 2014 से होना निश्चित हुआ। परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्रीदत्तशरणानन्दजी महाराज की पावन उपस्थिति में 16 महीनों की अवधि पर्यन्त अर्थात् 8 अप्रेल, 2016 तक चौबीस लाख के ‘‘ 33 गो-गायत्री महापुरुश्चरणों’’ का अनुष्ठान तैंतीस गो-गायत्री उपासकों द्वारा सम्पूर्ण गोवंश संरक्षण, सम्पोषण, संवर्धन के लिये ज्ञात इतिहास का दीर्घकालीन अपूर्व अनुष्ठान आदिशक्ति श्रीसुरभि गोमाता की प्रेरणा से एवं भगवत्कृपा से अनुप्राणित होकर सम्पन्न हुआ। इस अनुष्ठान की अवधि में चारों वेदों, अठारह पुराणों, श्रीभागवतजी, रामायण, महाभारत, ब्राह्मण ग्रन्थों मनु स्मृति आदि का विद्वान विप्रों द्वारा इसी परिसर में पारायण किया गया। पूज्या गोमाता की पावन कृपा राष्ट्र व राष्ट्रवासियों को प्राप्त हो, इस हेतु गोप्रेमी सनातनधर्मी हिन्दू जाति के विभिन्न समाजों का समागम और समाज सेवी संगठनों के सम्मेलन शिविर व संगोष्ठियों सहित अनेक आयोजन इस गोलोकतीर्थ परिसर में सम्पन्न हुए।

उपरोक्त गोहितकारी अनुष्ठानों के आयोजनों में गोसेवा के सभी बिन्दुओं पर विचार, मन्थन, चिन्तन, निष्कर्ष एवं सहमतिके साथ-साथ ही वेदलक्षणा गोवंश का संरक्षण, सम्पोषण, संवर्धन, पंचगव्य विनियोग के कुछ प्रयोग भी प्रारम्भ किये गये। जिसके उत्साहकारी परिणाम सामने आये हैं। इससे प्रेरित होकर शास्त्र प्रमाण,  सत् चिन्तन विवेक तथा अनुभव के आधार पर गोसेवा अनुष्ठान को राष्ट्रव्यापी रचनात्मक एवं सृजनात्मक महाभियान का रूप देने हेतु प्रमुख चार चरणों में विभाजित किया गया- गोवंश संरक्षण, गोपालन, गोसवंर्धन, पंचगव्य परिष्करण एवं विनियोग।

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