जगद्धात्री गोमाता का पूजन एवं आरती

            वेदादि शास्त्रों में वेदलक्षणा गोपूजन, अर्चन एवं आरती का बड़ा भारी महत्व है। सवत्सा गोमाता के पूजन में ईश्वर कोटि के पंचदेव, 33 कोटि के देव, ऋषि, पितृ आदि समस्त पूजनियों की पूजा समाहित है। श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा द्वारा स्थापित एवं संचालित गोसेवाश्रमों में प्रतिदिन प्रातः काल नियमित गोमाता का पूजन एवं सांयकाल गोआरती होती है, जिसमें आश्रम में निवास करने वाले साधक, सन्त, गोभक्त अतिथि, गोसेवक कर्मचारी एवं ग्वाल-बाल सम्मिलित होकर गोमाता का अनुग्रह प्राप्त करते हैं। अतः सभी श्रद्धालु गोसेवाप्रेमी सन्तों व गोभक्तों के लिये शास्त्र सम्मत संक्षिप्त गोपूजन विधि का उल्लेख किया जा रहा है।

गोवन्दनम्

नमो गोभ्यः श्रीमतीभ्यः सौरभेयीभ्य एव च । नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च  पवित्राभ्यो नमो नमः ।।1।।

त्वं माता सर्वदेवानां त्वं च यज्ञस्य कारणम् । त्वं तीर्थं सर्वतीर्थानां नमस्तेऽस्तु सदाऽनघे ।।2।।

यया सर्वमिदं व्याप्तं जगत्स्थावरजंगमम् । तां धेनुं शिरसा वन्दे भूतभव्यस्य मातरम् ।।3।।

गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः । गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम् ।।4।।

इत्याचम्य जपेत् सांय प्रातश्च पुरुष: सदा । यद्हान कुरुते पापं तस्मात् स परिमुच्यते ।।5।।

            श्रीमती, सौरभेयी, ब्रह्मसुता और सबको पावन करनेवाली गौओं को मेरा प्रणाम है।  हे निष्पापे!  तुम सब देवताओं की माता, यज्ञ की कारणरूपा और सम्पूर्ण तीर्थों की तीर्थरूपा हो, हम तुम्हें सदा प्रणाम करते हैं।  जिस गौ से यह चराचर अखिल जगत् व्याप्त है उस भूत और भविष्य की जननी गौ को मैं सिर नवाकर बारम्बार प्रणाम करता हूँ। गौएँ मेरे आगे हों, पीछे हों और मेरे हृदय में विराजमान हों।  मैं सदा गौओं के मध्य में ही निवास करूँ। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल और सांयकाल आचमन करके उपर्युक्त मन्त्र का जप करता है, उसके दिनभर के पाप नष्ट हो जाते हैं। इति गोवन्दनम् ।

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